भेड़िहारी — एक निडर किशोर की कहानी
भारत के बिहार, बेतिया जिले के नौतन प्रखंड के “भेड़िहारी” गांव से उठती यह कहानी साहस, आत्मविश्वास और न्याय के लिए जंग की है।
भारत वर्ष के उत्तरपूर्वी प्रान्त बिहार के उत्तर में अवस्थित बेतिया जिले ( पश्चिमी चम्पारण ) के नौतन प्रखंड में ” भेड़िहारी ” गांव के एक साधारण परिवार की कहानी है !
एक बार भयानक महामारी की चपेट में आने से गांव के लोग भेड़िहारी से पलायन कर गए थे। इसी क्रम में हमारे पूज्य बाबा ( दादा जी ) श्री ब्रह्मदेव लाल अपनी किशोर अवस्था ( लगभग 14 – 15 साल ) में अपने ननिहाल आ गए थे। उनकी किशोरावस्था की उम्र सहपाठियों के साथ बड़े मजे से खेलने – कूदने में बीत रही थी। समृद्ध ननिहाल में किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी एवं हर जरुरत आसानी से पूरी हो जाया करती थी।
सहसा, एक दिन सहपाठियों के साथ खेलते समय किसी बात में हम उम्र बालकों से तू-तू, मैं-मैं हो गयी। लेकिन एक वयस्क व्यक्ति की असमय एवं अवांछित टिप्पणी ने बालक श्री ब्रह्मदेव लाल के किशोर मन को अंदर तक मर्माहत कर दिया। यह टिप्पणी और कुछ नहीं बल्कि बिना किसी लड़के ( पुत्र उत्तराधिकारी आदि ) के ननिहाल परिवार में श्री ब्रह्मदेव लाल का पालन-पोषण होना था। यथा :
“मांस के ढेर पर गिद्ध रखवार!“
बात आयी गयी हो गई, लेकिन बालक श्री ब्रह्मदेव लाल के मन को चैन नहीं था! वह उसी पल अपनी माता के लाख मनाने पर भी नहीं माने और अपने वीरान पड़ी हुई गांव का रुख कर लिया। यहाँ गाँव पहुँचने पर माहौल असामान्य एवं मुश्किल भरा प्रतीत हुआ। फिर भी अपने कुटुम्ब जनों से सलाह-मशविरा करके अपनी खेती की जमीन को देखा। उसपर खेती-बाड़ी करने की योजना बनाने लगे। जीवन यापन के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ होना नितांत आवश्यक था।
पर विधाता ने यहां भी उनके लिए कठिनाई वाली घड़ी पहले से कर रखी थी। उस क्षेत्र के मशहूर महावीर भगत ( पहलवान ) की मंजूरी से ही सभी खेती-बाड़ी होती थी। यह घोर बेईमानी, ना-इंसाफी एवं हकमारी बालक श्री ब्रह्मदेव लाल को कत्तई मंजूर नहीं था। लोगों के लाख मना करने पर भी उन्होंने महावीर भगत ( पहलवान ) से दो-दो हाथ करने की ठानी! मरना तो दोनों हालात में था।
महावीर भगत ( पहलवान ) ने जब बालक श्री ब्रह्मदेव लाल से पूछा —
“तुम किस लाठी-भाले से लड़ाई करोगे?”
इस पर बालक श्री ब्रह्मदेव लाल ने सदा अपने क़मर में बांधे हुए लकड़ी के बेंट के चाकू को निकालकर दिखाते हुए कहा — “इससे”
निर्भीक एवं निडर बालक श्री ब्रह्मदेव लाल के इस प्रकार अपने हक़ के लिए कड़े प्रतिरोध का ऐसा छाप पड़ा कि महावीर भगत ( पहलवान ) ने तुरंत उनके बाप-दादाओं की पुश्तैनी जमीन वापस दे दी एवं खेती-बाड़ी करने की पूरी इजाज़त भी।
इसका बाद में दूरगामी प्रभाव पड़ा — जो लोग भी इनके अन्य स्थानों पर की जमीन अपने कब्जे में रखे हुए थे, महावीर भगत ( पहलवान ) के डर से स्वयं बिना रोक-टोक के छोड़ दिए।
इस प्रकार बालक श्री ब्रह्मदेव लाल ने अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती-बाड़ी शुरू किया। घर-मकान, गाय-बैल आदि की व्यवस्था की। सब कुछ व्यवस्थित हो जाने पर अपनी माता एवं सम्बन्धियों को लेकर गाँव में फिर से बसाया।
यह छोटी सी किन्तु स्वयं पर भरोसा रखने वाले निडर एवं खुद्दार व्यक्तित्व वाले बालक “श्री ब्रह्मदेव लाल” की कहानी आज के जमाने के युवा एवं बालक को काफी प्रेरित करती है!